शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

मैं नासमझ

मम्मा, एक बात तो माननी पड़ेगी....किस्मत हो तो पापा जैसी। कितनी आज्ञाकारी और प्यार करने वाली पत्नी मिली है। वे आपकी जिंदगी में जलालत के कितने भी सफे जोड़ दें, आपकी मोहब्बत में रंचमात्र भी कमी नहीं आएगी। काश! उन्हें इस मोहब्बत की क़द्र होती। मुझे सचमुच हैरानी होती है कि जो शख्स भैया को हराम की औलाद ( माफ़ करना पर सच तो यही है) कहता है उसके पहलू में आप इतनी खुश कैसे रह लेती हैं। निस्संदेह आप दोनों के बीच जुडाव का कोई ऐसा तंतु ज़रूर है जिसे मैं देख नहीं पाती या देख कर भी समझ नहीं पाती। खैर। गुड नाईट !

3 टिप्‍पणियां:

  1. अलग सा लेखन है आपका.
    कहीं कहीं उलझनों का उलझाव अधिक मुखरित होता है

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  2. दोनों के बीच जुडाव का तंतु हम भी ढूंढ रहे हैं ...!

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