मंगलवार, 19 जनवरी 2010

त्रासदी

जिन्दगी कब, कैसे, कितनी बदल जाती है पता ही नहीं चलता। जो सब कुछ होता है वह कुछ भी नहीं रहता। बहुत कुछ से कुछ भी नहीं तक का सफ़र बड़े अजीबोगरीब ढंग से तय होता है। यह सफ़र बहुत त्रासद भी होता है। बहुत सुखद भी, बहुत कष्टप्रद भी। आज मैं जहाँ हूँ वहां क्यों हूँ ? जहाँ नहीं हूँ वहां क्यों नहीं हूँ ? ये सवाल जिंदगी भर परेशान करते हैं. फिर भी हम इनका उत्तर नहीं तलाश पाते। हम अक्सर खुद से ही हारते हैं। कोई दूसरा हमें हराता नहीं , हाँ हमारी हार पर खुश ज़रूर हो सकता है। उन्हें बधाई जो आज खुश हैं। लेकिन उन्हें भी याद रहे कि हारा हुआ खिलाड़ी भले ही कभी न जीते पर विजेता हमेशा विजेता नहीं रह सकता। एक न एक दिन उसे भी हारना ही होता है। आमीन!

2 टिप्‍पणियां:

  1. हर मनुष्य के भीतर यही सवाल रहते हैं!!! जहां में हूँ वहाँ क्यूँ हूँ जहां नहीं हूँ वहाँ क्यूँ नहीं!!!

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  2. सही बात. इन्सान तमाम उम्र, सवालो में ही काट देता हैं.

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