शनिवार, 29 मई 2010

आ अब लौट चलें !

मम्मा,
उरई प्रवास का कल आखिरी दिन है। कल पापा के साथ हम लोग घर चलेंगे। आप फिर अकेली हो जाएँगी। है न ? यही सच है ? मेरे होने का कोई मतलब नहीं ? ऐसा कब होगा कि मुझे अपने पास पाकर आपको सकल ज़हान अपनी मुट्ठी में लगे। मुझे छूती हो तो पुलकन होती है न ? मुझे बांहों में समेटती हो तो ऐसा नहीं लगता मानो पूरा आसमान मुट्ठी में आ गया हो ? हमारी दुनिया सबसे न्यारी और सबसे प्यारी है माँ...... मैं हूँ ... तुम हो ... पापा हैं ...और क्या चाहिए ? सागर कितने गंदे हैं .... जब देखो बिना बात के मुंह फुला लेते हैं ... अब हम उनसे भी कोई मतलब नहीं रखेंगे ...! ठीक ? चलो अब अच्छी माँ कि तरह मुझे सुलाओ .... सुबह जल्दी उठाना भी तो है ..... । नहीं तो पापा कहेंगे आलसी हो गया है उल्लू का नाती। गुड नाईट ।

1 टिप्पणी:

  1. मेरे नए ब्‍लोग पर मेरी नई कविता शरीर के उभार पर तेरी आंख http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html और पोस्‍ट पर दीजिए सर, अपनी प्रतिक्रिया।

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