शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

यही है ज़िन्दगी

दिल ढूंढता है फ़िर वही फुर्सत के रात-दिन! ..... अब तो फुरसत ही फुरसत। ना कोई फोन, ना इंतज़ार, ना उम्मीद। कितना अजीब होता है किसी इबारत का मिटना या किसी इमारत का ढहना। लिखने या बनाने में कितने सपने, कितने दिन और कितनी हसरतें होम हो जाती हैं। और हासिल ? हासिल कुछ भी नहीं। हाँ कुछ हताशाएं , कुछ निराशाएं कुछ पराजय ज़रूर आपके खाते में जमा हो जाती हैं। ज़िन्दगी के रहते हम कभी उसकी अहमियत समझ ही नहीं पाते। ये वेशकीमती वक्त हम लड़ने-झगड़ने, रूठने-मनाने में जाया कर देते हैं। जब हाथ में कुछ नहीं रहता तब पछताने से भी क्या हासिल?

1 टिप्पणी:

  1. लिखने या बनाने में कितने सपने, कितने दिन और कितनी हसरतें होम हो जाती हैं। और हासिल ? हासिल कुछ भी नहीं।

    ठीक कहा है. पर बनाने और लिखने के बाद की तसल्ली तो मायने रखती ही है.

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