सोमवार, 22 मार्च 2010
स्वागतम पुलकित
४६० घंटे हो गये हैं भैया के अवतरण को। अबकी बार मुझे जरूर लाना। २७६०० सेकेण्ड आप उनके साथ रह लीं। यह वक्फा कम नहीं होता। पुलकित की पुलकन से मैं पुलक उठती हूँ तो आप जो हर पल उसे सहेजती हैं कितना सुख महसूस करती होंगी। मैं जब तक आउंगी तब तो वो मुझे खिलाने लायक हो जायेगा। जिंदगी को समझ पाना कितना मुश्किल होता है। खुद को ही देख लीजिये, खूब परेशां होती हैं, झुंझलाती हैं, रोती हैं, मगर इन सबके बाद जो सुख, महिमा और गौरव मिलता है वह दुनिया की और किसी भी अनुभूति में नहीं है। सागर याद आते हैं ? पुलकित भैया को उनके बारे में बताती हो या नहीं ? ऐसा न हो कि वे आयें तो भैया उन्हें पहचाने भी नहीं। इसे बिलकुल अपने जैसा बनाना, लेकिन अपना सब्र मत देना। समझोतावादी तो बिलकुल भी न बनाना। जी चाहता है इसी पल आपके पास पहुँच जाऊं। काश ऐसा हो पाता। उसे मेरा और सागर का ढेर सारा प्यार देना।
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
आप तो ऐसी न थीं
बहुत नाइंसाफी है, आपको कितने दिन से मेरा ब्लॉग देखने की फुर्सत नहीं मिली। आप तो ऐसे न थे। आज मिहोना में शादी है, बहुत बोरियत हो रही है, आपको क्या!
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
सोचना तो सही!
मम्मा ! जिंदगी कितनी अनुपम है! सब कुछ वक़्त के हाथ में। वक़्त से बड़ा हाकिम कोई नहीं। वक़्त जब अनुकूल हो तो प्रतिकूल लोग भी कितने अपने से लगने लगते हैं। जो अनुकूल होते हैं वे हाशिये पर भेज दिए जाते हैं। लेकिन होने और लगने में फर्क तो होता है न ? जो होता है वह दीखता नहीं ---- जो दीखता है वह होता नहीं। लेकिन जिंदगी में मिराज़ न हों तो हम शायद खुश रहना ही भूल जाएँ। वक़्त का क्या ठिकाना! कभी किसी का सगा नहीं होता। हाँ, इतना तय है जो कल था वह आज नहीं --- जो आज है वह भी कल नहीं होगा। ऐसे ही किसी कल में हम और आप भी नहीं होंगे। रोजे महशर हम शर्मिंदा न हों इसके लिए ज़रूरी है हर रिश्ते को उसका पावना देना। कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसा कर पाने में जाने- अनजाने कहीं कोई चूक हो रही हो। सोचना तो सही!
शुक्रवार, 22 जनवरी 2010
आओ हम जश्न मनाएं!
कैसी हो गयी हो मम्मा आप? इतना अधैर्य ? इतनी अकुलाहट ? इतनी उत्तेजना ? लगता है मेरी मम्मा तो कहीं खो गयी। वापस आ जाओ माँ! फिर पहले जैसी हो जाओ। मेरे आने का वक़्त हो रहा और तुम बेवज़ह परेशान हो रही हो। मुझे आ जाने दो। मैं तुम्हे इतना सुख दूंगी जितना तुमने सपने में भी नहीं सोचा होगा। जीवन में बहुत कुछ अनचाहा होता है। वो हमें दुःख देता है। इसी अनचाहे के बीच सुख के क्षण भी हम तक आ ही जाते हैं। कई बार जो अनचाहा होता है वही जीवन की सबसे बड़ी नियामत बन जाता है। तुम्हारे साथ भी तो यही हुआ। ईश्वर ने सब कुछ दे दिया। अब उसका शुक्रिया अदा करने के बजाय उस से शिकवा क्यों? आओ हम जश्न मनाएं! आई लव यू मम्मा!
गुरुवार, 21 जनवरी 2010
आई लव यूं !
मम्मा, बहुत ही अच्छा लगा ये जानकर कि आप मेरा ब्लॉग देख रही हैं। आप बहुत ही अच्छी हैं। आप रोज पढ़ोगी तो रोज लिखा भी जायेगा। प्रोमिस!
----- क्या अबके बरस सचमुच वसंत नहीं आया। मुझे तो लगा इस बार वसंत ज्यादा मन और मान से आया। सुबह से शाम तक तो बगरा रहा वसंत। दिन और रात हर पल साथ रहे कंत। आनंद अनंत। तुम ऐसे ही खुश रहा करो। तुम प्रफ्फुल्लित रहती हो तो मुझे भी भला लगता है। हमारे जीवन में कुछ ऐसा भी होता जिसे कहा नहीं जा सकता. हम चाहते हैं कि उस अनकहे को कोई समझ ले। ऐसा हो जाता है तो हम खुश हो लेते हैं। नहीं हो पाता है तो उदास हो जाते हैं। दोनों ही मिलते किसी अपने से ही हैं। बड़ी या अहम बात यह नहीं है कि हम खुश हैं या उदास। असल बात यह है कि हमारे जीवन में कोई अपना है या नहीं! तुम कितनी खुशकिस्मत हो कि तुम्हारे जीवन में इतने सारे अपने हैं। और मैं भी खुशनसीब हूँ जो तुम मेरी इतनी अपनी हो। और क्या चाहिए? तुम हो ! पा हैं! मैं भी आने वाली हूँ। हम तीनों खूब खुश रहा करेंगे। देखना मैं तुम्हें पल भर को भी उदास नहीं होने दूंगी। वादा!
मंगलवार, 19 जनवरी 2010
त्रासदी
जिन्दगी कब, कैसे, कितनी बदल जाती है पता ही नहीं चलता। जो सब कुछ होता है वह कुछ भी नहीं रहता। बहुत कुछ से कुछ भी नहीं तक का सफ़र बड़े अजीबोगरीब ढंग से तय होता है। यह सफ़र बहुत त्रासद भी होता है। बहुत सुखद भी, बहुत कष्टप्रद भी। आज मैं जहाँ हूँ वहां क्यों हूँ ? जहाँ नहीं हूँ वहां क्यों नहीं हूँ ? ये सवाल जिंदगी भर परेशान करते हैं. फिर भी हम इनका उत्तर नहीं तलाश पाते। हम अक्सर खुद से ही हारते हैं। कोई दूसरा हमें हराता नहीं , हाँ हमारी हार पर खुश ज़रूर हो सकता है। उन्हें बधाई जो आज खुश हैं। लेकिन उन्हें भी याद रहे कि हारा हुआ खिलाड़ी भले ही कभी न जीते पर विजेता हमेशा विजेता नहीं रह सकता। एक न एक दिन उसे भी हारना ही होता है। आमीन!
सोमवार, 18 जनवरी 2010
दर्द का रिश्ता !
छीजना तो जानती हैं न आप? धीरे-धीरे सब कुछ ख़त्म हो जाता है। हाथ में रह जाता है केवल खालीपन। रिश्ता भी ऐसे ही छीजता है। पहले आप मुझे कितना कुछ बताती थीं। करीब-करीब सब कुछ। कब सोकर उठीं। कब चाय पी। कब साहेब गये। कब आये। कब नहाया। कब शेविंग की। कब खाया। एक - एक पल मुझे पता होता था। जागती थीं तो गुड मोर्निंग और सोती थीं तो गुड नाईट कहती ही थीं। अब ऐसा नहीं होता। आज साहेब वापस नहीं आये। लेकिन आपको यह बिलकुल भी ज़रूरी नहीं लगा कि मुझे बता देतीं। तुम्हें लगा होगा कहीं मैं चेंटने न लागुन। आखिर उनका फ़ोन भी तो आना होगा। है न ! कैसे हो जाता ये सब? क्यों बदल जाते हैं सरोकार ? सब अतीत हो गया। ऐसे ही एक दिन एक रिश्ता भी अतीत हो जायेगा। आपको नहीं पता, जब कोई रिश्ता व्यतीत होता है तो कितना दर्द होता है। काश, कभी आप भी इस दर्द को महसूस कर पायें!
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