एक सवाल है ! आपके पास उत्तर हो तो जरूर दें। जिंदगी होती कितनी है ? गिनती के कुछ बरस। बचपन और बुढापे को हटा दें तो यही कोई चालीस बरस। यानि १४,६०० दिन। रोज छः घंटे भी सोये तो ३६५० दिन नींद निगल गयी। बचे १०९५० दिन। दैनिक क्रियाओं, नाश्ता और दो समय का खाना, सजना-संवरना आदि कामों में भी रोज कम से कम छः घंटे खर्च होते हैं। यानी ३६५० दिन और चले गये। अब बचे ७३०० दिन। पढाई और नौकरी को रोज आठ घंटे भी दिए तो ४८६६ दिन और निकल गये। हाथ में रह गये २४३४ दिन। एक सर्वे के मुताबिक कम से कम चलने वाला शख्स भी रोजाना न्यूनतम दो घंटे ट्रैफिक में बिताता है। ये हुए १२१६ दिन। हाथ में रह गये केवल १२१८ दिन। आप बीमार भी होंगे। नाते-रिश्तेदारों के यहाँ होने वाले आयोजनों में भी जायेंगे। पिकनिक - सिनेमा भी जायेंगे। लम्बी यात्राएँ भी करेंगे। साल में २० दिन इन कामों में खर्च किए तो ८०० दिन और खिसक गये। बाकी बचे ४१८ दिन। यदि सब-कुछ ठीक-ठाक रहा तो आपके पास जीवन में केवल ४१८ दिन ऐसे हैं जिन्हें आप अपनी मर्जी से जी सकते हैं। इन थोड़े से दिनों में हम मोहब्बत क्यों नहीं करते ? लडाई-झगडे, निंदा और नफरत में क्यों गुज़र जाता है ये बेशकीमती वक्फा ? सोचिये और करिए मोहब्बत---मोहब्बत---सिर्फ़ और सिर्फ़---मोहब्बत !!! आमीन !!!
- मनो
पुनःश्च : मेरे दोस्त ने मुझसे मेरी चाहत पूछी है। बस इतनी सी ही तो है मेरी चाहत। लेकिन ईमानदार और पारदर्शी भरोसे वाली सरल और तरल चाहत।

1 टिप्पणियाँ:
सरलता और सहजता से जिन्दगी जीये जाईये...दिन गिनना ठीक नहीं.
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